“माँ की भक्ति तभी पूर्ण, जब प्रकृति भी सुरक्षित” माँ की भक्ति और पर्यावरण संरक्षण दोनों के ही मार्ग एक, पवित्र नवरात्र पर माँ पूर्णागिरी पर्यावरण संरक्षण समिति की अध्यक्ष दीपा देवी का बड़ा संदेश।
➡️ आने वाले समय में माँ पूर्णागिरी मेला बनेगा ‘ग्रीन आस्था’ का प्रतीक, पॉलीथिन मुक्त और स्वच्छता पर रहेगा विशेष जोर.
➡️ माँ दुर्गा की उपासना वस्तुतः प्रकृति के आदि स्वरुप की ही हैं पूजा.
➡️ पर्यावरण की रक्षा करना भी हमारी धार्मिक आस्था का ही माना जा सकता हैं अभिन्न हिस्सा.
टनकपुर (चम्पावत)। नवरात्र के पावन अवसर पर आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश सामने आया है। माँ पूर्णागिरी पर्यावरण संरक्षण समिति की अध्यक्ष दीपा देवी ने कहा कि माँ दुर्गा की सच्ची आराधना तभी सार्थक है, जब हम प्रकृति को भी उतनी ही श्रद्धा और जिम्मेदारी के साथ संजोकर रखें। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि “आदि शक्ति ही प्रकृति का स्वरूप हैं, इसलिए माँ की भक्ति और पर्यावरण संरक्षण-दोनों मार्ग एक ही हैं।”
उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध माँ पूर्णागिरी मेले को ‘ग्रीन मेला’ के रूप में विकसित करने की दिशा में पहल की जा रही है। अगर स्थानीय प्रशासन और लोगों का भरपूर सहयोग मिलेगा तों बहुत जल्द ये मुहिम परवान चढ़ सकती हैं। दीपा देवी ने बताया कि मेले में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को पॉलीथिन का उपयोग न करने, कूड़ा इधर-उधर न फेंकने और स्वच्छता बनाए रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसके लिए जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा, जिससे हर श्रद्धालु खुद को इस पवित्र कार्य का सहभागी समझे।
उन्होंने बताया कि पवित्र शारदा घाट पर विशेष स्वच्छता अभियान चलाकर सफाई के प्रति जनमानस में नई चेतना जगाई जाएगी। स्वयंसेवकों की टीम घाट और मेला क्षेत्र में सक्रिय रहकर श्रद्धालुओं को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देगी। उद्देश्य यह है कि आस्था के इस महापर्व में स्वच्छता भी एक संस्कार के रूप में स्थापित हो।
दीपा देवी ने कहा कि नवरात्र केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि संकल्प का भी अवसर है। “अगर हर श्रद्धालु यह ठान ले कि वह प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, तो यह मेला देशभर के लिए एक आदर्श बन सकता है,” उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से भावुक अपील करते हुए कहा कि माँ पूर्णागिरी धाम की पवित्रता और प्राकृतिक सुंदरता को बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। “आइए, इस नवरात्र पर हम सिर्फ दीप नहीं जलाएं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी अपने भीतर प्रज्ज्वलित करें,” ।

