हैरतअंगेज – नगर पालिका के नेहरू पार्क में ‘द्रोपदी का रंगमहल’! घास के नीचे छिपा मौत का गड्ढा, जिम्मेदारों को शायद हादसे का इंतजार, तीन दिन पहले एक स्थानीय व्यक्ति भी गड्ढे मे गिरे, पालिका कर्मी ने बचाया।

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हैरतअंगेज – नगर पालिका के नेहरू पार्क में ‘द्रोपदी का रंगमहल’! घास के नीचे छिपा मौत का गड्ढा, जिम्मेदारों को शायद हादसे का इंतजार, तीन दिन पहले एक स्थानीय व्यक्ति भी गड्ढे मे गिरे, पालिका कर्मी ने बचाया।

➡️ कुछ वर्षों पूर्व बनबसा के कैनाल मे पानी से भरे गड्ढे मे हुई थी एक बच्चे की दर्दनाक मौत.

➡️ पूर्व के हादसों से भी सबक नहीं लें रहे जिम्मेदार विभाग.

टनकपुर (चम्पावत) । नगर पालिका के नेहरू पार्क में बना पानी से लबालब भरा करीब साढ़े चार फीट गहरा और तीन फीट चौड़ा गड्ढा इन दिनों लोगों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। हैरत की बात यह है कि पार्क में प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चे टहलने व खेलने आते हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों की नजर शायद अभी तक इस “अदृश्य खतरे” पर नहीं पड़ी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह गड्ढा पूरी तरह घास-फूस से ढका हुआ है। ऊपर से देखने पर किसी सामान्य घास वाले हिस्से जैसा प्रतीत होता है, जबकि नीचे गहरा पानी भरा हुआ है। ऐसे में किसी भी व्यक्ति, विशेषकर बच्चों के अचानक इसमें गिरने की आशंका बनी हुई है।

विडंबना देखिए कि तीन दिन पूर्व एक स्थानीय व्यक्ति इस गड्ढे में गिर चुका है। गनीमत रही कि मौके पर मौजूद पालिका कर्मी नवीन गहतोड़ी ने उसे बाहर निकाल लिया, अन्यथा बड़ा हादसा भी हो सकता था। इस घटना में उसका मोबाइल फोन भी खराब हो गया।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह गड्ढा बिल्कुल वैसे ही भ्रम पैदा करता है जैसे महाभारत में द्रोपदी के रंगमहल का मायाजाल, जहां पानी और जमीन का अंतर समझ पाना कठिन था। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां भ्रम से अपमान हुआ था, यहां किसी दिन जान भी जा सकती है।

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मामले की शिकायत सीएम पोर्टल तक पहुंच चुकी है, लेकिन समाधान अभी तक धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा। उधर नगर पालिका और जल संस्थान भी मानो जिम्मेदारी की गेंद एक-दूसरे के पाले में फेंकने की प्रतियोगिता में जुटे हैं। एक विभाग इसे दूसरे का कार्य बता रहा है और दूसरा पहले का। इस सम्बन्ध मे चेयरमेन का कहना है कि इस सम्बन्ध मे जल संस्थान कों अवगत कराया जा चुका है। सवाल यह है कि क्या किसी मासूम के गिरने या किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदार विभागों की नींद खुलेगी? आखिर नेहरू पार्क जैसे सार्वजनिक स्थल पर खुलेआम मौजूद यह “जलकुंड” कब तक लोगों की सुरक्षा से खिलवाड़ करता रहेगा?

फिलहाल पार्क में आने वाले लोगों को अपने कदम बेहद संभालकर रखने होंगे, क्योंकि यहां हरियाली के बीच छिपा यह गड्ढा किसी भी क्षण किसी परिवार की खुशी को हादसे में बदल सकता है। जनता इंतजार कर रही है समाधान का, जबकि जिम्मेदार विभाग शायद अभी भी किसी बड़ी घटना के बाद कार्रवाई की औपचारिकता निभाने की तैयारी में हैं। अलबत्ता हादसे के बाद कार्यवाही होनें के बजाय हादसे से पहले सुरक्षा होना सुशासन की खास पहचान माना जाता है। लेकिन मानों यहाँ हादसों का इंतजार हो रहा है।

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