उत्तराखण्ड की सड़कों पर हॉर्न कम, आइटम नंबर ज़्यादा, उत्तराखण्ड की शांत वादियों, सादगी भरी जीवनशैली और पहाड़ों की नैसर्गिक खामोशी को चीरता शोर – शशांक पाण्डेय

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उत्तराखण्ड की सड़कों पर हॉर्न कम, आइटम नंबर ज़्यादा, उत्तराखण्ड की शांत वादियों, सादगी भरी जीवनशैली और पहाड़ों की नैसर्गिक खामोशी को चीरता शोर – शशांक पाण्डेय

चम्पावत। उत्तराखण्ड अपनी शांत वादियों, सादगी भरी जीवनशैली और पहाड़ों की नैसर्गिक खामोशी के लिए जाना जाता है। यहाँ की सुबह कभी मंदिरों की घंटियों, पक्षियों की चहचहाहट और हल्की-सी हवा की सरसराहट से शुरू होती थी। लेकिन इन दिनों इस शांति में एक नया, तेज़ और कर्कश हस्तक्षेप साफ़ सुनाई देने लगा है—हाई प्रेशर हॉर्न, वो भी पूरे-पूरे फिल्मी गीतों के साथ।

आज हालत यह है कि जैसे ही कोई टिप्पर, ट्रक या भारी वाहन सड़क पर दिखता है, कान पहले से ही चौकन्ने हो जाते हैं। किसी वाहन से “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा…” की धुन गूंजती है, तो कहीं “कजरारे कजरारे…” पूरे इलाके को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। कुछ चालकों ने तो “परदेशी परदेशी…” जैसे गीतों को स्थायी हॉर्न बना लिया है। सड़क पर चलते हुए ऐसा महसूस होता है मानो हम किसी पहाड़ी रास्ते पर नहीं, बल्कि चलती-फिरती डिस्को में फँस गए हों।

शुरुआत में ये धुनें सुनकर लोगों के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ सकती है, लेकिन जब यही आवाज़ें दिन-रात, हर मोड़, हर चढ़ाई और हर बस्ती के पास गूंजने लगें, तो यही मनोरंजन असहनीय शोर में बदल जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में आवाज़ का असर और भी ज़्यादा होता है—एक हॉर्न की गूंज कई बार दूर-दूर तक फैल जाती है, जिससे पूरे इलाके का माहौल प्रभावित होता है।

यह समस्या केवल कानों की परेशानी तक सीमित नहीं है। हाई प्रेशर हॉर्न बच्चों की पढ़ाई में बाधा बन रहे हैं, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए मानसिक तनाव पैदा कर रहे हैं और गर्भवती महिलाओं के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकते हैं। स्कूलों, अस्पतालों और रिहायशी इलाकों के पास इस तरह के हॉर्न का बजना नियमों का खुला उल्लंघन है, फिर भी शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब ये धुनें सुनाई न दें।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पहाड़ी सड़कों पर पहले ही जोखिम कम नहीं हैं। संकरी सड़कें, तीखे मोड़, अचानक सामने आ जाने वाले वाहन और पैदल चलते ग्रामीण—इन सबके बीच तेज़ और लंबे समय तक बजने वाले हॉर्न भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं। कई बार चालक सही संकेत देने के बजाय गीत वाला हॉर्न बजाता है, जिससे सामने वाले को खतरे का अंदाज़ा ही नहीं लग पाता। यह लापरवाही किसी भी समय बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

अक्सर देखा जाता है कि कुछ चालक इसे अपनी शान और रुतबे से जोड़कर देखते हैं। जैसे भारी वाहन के साथ ज़ोरदार, अलग तरह का हॉर्न होना ही चाहिए। लेकिन यह सोच न सिर्फ़ गलत है, बल्कि समाज और पर्यावरण दोनों के लिए घातक है। शोर प्रदूषण भी उतना ही खतरनाक है जितना हवा या पानी का प्रदूषण, फर्क बस इतना है कि इसके असर धीरे-धीरे सामने आते हैं।

प्रशासन और परिवहन विभाग द्वारा नियम बनाए गए हैं कि हाई प्रेशर और मल्टी-टोन हॉर्न प्रतिबंधित हैं। समय-समय पर चालान की कार्रवाई भी होती है, लेकिन वह नाकाफी साबित हो रही है। ज़रूरत है नियमित जांच, सख्त कार्रवाई और सबसे बढ़कर जनजागरूकता की। जब तक आम लोग खुद यह नहीं समझेंगे कि यह समस्या है, तब तक सिर्फ़ नियमों से समाधान संभव नहीं।

उत्तराखण्ड की पहचान उसकी शांति, संस्कृति और सादगी से है। अगर सड़कों पर हर पल फिल्मी गीतों वाले हॉर्न गूंजते रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ उस उत्तराखण्ड को शायद कभी महसूस ही न कर पाएं, जिसे हम जानते हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि हम शोर को नहीं, समझदारी को प्राथमिकता दें। हॉर्न का काम चेतावनी देना है, मनोरंजन करना नहीं। पहाड़ों की खामोशी को वापस लौटाने के लिए यह सोच बदलना ही होगा—वरना “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा” की धुन में गाँव की असली प्यारी शांति कहीं खो जाएगी।

(लेखक शशांक पाण्डेय चम्पावत ज़िले के निवासी एवं समसामहिक मुद्दों पर लिखते है)

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