गाँधी मैदान में गणतंत्र की औपचारिकता- न विचारों की आजादी न संवेधानिक गरिमा, शहीदों की बात करते ही खाली होने लगा मंच, सत्ता स्तुति में ही सिमट गया समारोह, नारा महिला साशक्तिकरण का और महिला ईओ का नहीं दिखा सम्मान।
टनकपुर (चम्पावत)। गाँधी मैदान में नगर पालिका टनकपुर द्वारा आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह इस बार राष्ट्रीय पर्व कम और सत्ता-आरती कार्यक्रम ज़्यादा नजर आया। तिरंगा तो फहराया गया, लेकिन संविधान की आत्मा को मंच से उतार दिया गया। कार्यक्रम में उस समय भूचाल आ गया, जब युवा सभासद चर्चित शर्मा ने सरकार की वाहवाही करने के बजाय देश के अमर शहीदों, बलिदान और लोकतंत्र की असली परिभाषा याद दिला दी। सच की यह खुराक मंचासीन नेताओं को इतनी कड़वी लगी कि चेयरमेन समेत कई जनप्रतिनिधि बीच कार्यक्रम में ही मंच छोड़कर निकल लिए। सवाल सीधा है, क्या गणतंत्र दिवस अब सच से भागने का दिन बन गया है?
सभासद ने मंच से यह नसीहत भी दी कि राष्ट्रीय पर्वों को सत्ता-प्रचार का अखाड़ा न बनाया जाए, लेकिन यह बात शायद सत्ता की कुर्सियों पर बैठों को नागवार गुज़री। शहीदों का गुणगान मंच को बोझ लगने लगा और सरकार का जयघोष ही राष्ट्रवाद का प्रमाण मान लिया गया। विडंबना यहीं नहीं रुकी।
मंच से तत्कालीन अधिशासी अधिकारी की बढ़ा-चढ़ाकर तारीफ की गई, मानो विदाई नहीं बल्कि महिमामंडन समारोह हो। दूसरी ओर, नवागत महिला अधिशासी अधिकारी का न सम्बोधन हुआ न बोलने दिया गया और न ही सम्मान मिला।
यही है वह तथाकथित नारी सम्मान, जिसकी दुहाई हर मंच से दी जाती है? और हद तो तब हो गई जब पांच दिन बीत जाने के बावजूद महिला ईओ को चार्ज तक नहीं सौंपा गया। सवाल उठता है कि महिला सशक्तिकरण केवल बैनरों और भाषणों तक सीमित है या फिर कुर्सी देने में भी उसका कोई अर्थ है?
गाँधी मैदान, जहां विचारों की आज़ादी और सत्य के प्रतीक महात्मा गाँधी का नाम जुड़ा है, वहीं आज सच बोलने पर मंच खाली होने लगा। यह दृश्य बताता है कि टनकपुर में गणतंत्र मनाया नहीं गया, बस निभाया गया। गणतंत्र दिवस का मतलब सिर्फ झंडा फहराना नहीं, बल्कि सच सहने की ताकत, सवाल स्वीकारने का साहस और बराबरी देने की ईमानदारी है।अफसोस, इस बार ये तीनों ही चीज़ें गाँधी मैदान से ग़ायब रहीं।


