मेला समाप्त होते ही बुझा दी गयीं रास्तो की रोशनी, अब अंधेरे के भरोसे माँ पूर्णागिरि धाम की यात्रा!”,”प्रशासन के आदेश एक तरफ, ठेकेदार की मनमानी एक तरफ; अंधेरे में चल रहे श्रद्धालु”, तीन दिन व्यवस्था रखने के निर्देश लेकिन तीसरे घंटे ही गायब हुई रोशनी।
➡️ ककराली गेट से ठूलीगाढ़ तक पसरा अंधेरा, जंगली जानवरों के भय के बीच यात्रा को मजबूर श्रद्धालु,
➡️ लोगों का कहना है कि सरकारी मेला क्या गया, उजाला भी चला गया! अंधेरे के भरोसे माँ पूर्णागिरि की यात्रा कर रहे श्रद्धालु….
टनकपुर (चम्पावत)। माँ पूर्णागिरि धाम की धार्मिक यात्रा इन दिनों श्रद्धा के साथ-साथ जोखिम का भी पर्याय बनती जा रही है। सरकारी तौर पर मेले का समापन 15 जून को हुआ, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ विभागों और ठेकेदारों ने समापन का अर्थ व्यवस्थाओं का तत्काल विसर्जन समझ लिया है। जानकारी के अनुसार, मेले के समापन के तुरंत बाद जिला पंचायत के बिजली ठेकेदार द्वारा ककराली गेट से लेकर ठूलीगाढ़ तक लगाए गए पथ प्रकाश (स्ट्रीट लाइट) उपकरणों को आनन-फानन में हटाने का कार्य शुरू कर दिया गया। परिणामस्वरूप पूरा मार्ग घोर अंधकार की चपेट में आ गया है और माँ पूर्णागिरि के दर्शन को आने वाले श्रद्धालु रात के समय अंधेरे में यात्रा करने को मजबूर हैं।
विडंबना यह है कि जिला प्रशासन द्वारा मेले के समापन के बाद भी तीन दिनों तक सभी व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से संचालित रखने के निर्देश जारी किए गए थे, ताकि दूर-दराज़ से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। लेकिन ऐसा लगता है कि बिजली ठेकेदार के लिए प्रशासनिक आदेशों से अधिक महत्व सामान समेटने की जल्दबाजी का था।स्थानीय लोगों का कहना है कि मार्ग पर घना अंधेरा होने से जंगली जानवरों का खतरा भी बढ़ गया है। पहाड़ी और जंगल से सटे इस क्षेत्र में रात्रि के समय आवाजाही करना पहले ही चुनौतीपूर्ण रहता है, ऊपर से प्रकाश व्यवस्था हट जाने से श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासन ने व्यवस्थाएं जारी रखने के स्पष्ट निर्देश दिए थे, तो आखिर किसके आदेश पर प्रकाश व्यवस्था हटाई गई? क्या ठेकेदार प्रशासनिक निर्देशों से ऊपर है, या फिर जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे मामले से अनजान बने हुए हैं? फिलहाल माँ पूर्णागिरि धाम आने वाले श्रद्धालु भक्ति के साथ-साथ अंधेरे से भी मुकाबला कर रहे हैं। देखने वाली बात होगी कि प्रशासन इस मामले का संज्ञान लेकर श्रद्धालुओं को पुनः रोशनी की सुविधा उपलब्ध कराता है या फिर “मेला खत्म, जिम्मेदारी खत्म” की परंपरा यूँ ही चलती रहेगी।

