चम्पावत वॉइस की विशेष रिपोर्ट – सफाई का ठेका या तयशुदा खेल? नगर पालिका में फिर गरमाई केपीएस की चर्चा, टनकपुर नगर पालिका परिषद मे केपीएस के सात साल, क्या वास्तव मे रहे बेमिसाल? ठेके के नाम पर करोड़ों खर्च, फिर भी गंदगी से क्यों नहीं मिली निजात।

➡️ आखिर क्यों पालिका के सोशल मीडिया मंचों पर केपीएस की कथित उपलब्धियों का गुणगान देखने कों मिल रहा है.
➡️ सात साल मे सफाई व्यवस्था का क्या बदला हाल ?
➡️ पर्यावरण मित्रो के हितो कों लेकर नये टेंडर मे क्या हो रहे है बदलाव, क्या जिम्मेदार देंगे जवाब.
➡️ सफाई के टेंडर मे डमी संस्था कों मैदान मे उतारने की चर्चा भी होने लगी है तेज.
टनकपुर (चम्पावत)। नगर पालिका परिषद में सफाई व्यवस्था के नए टेंडर को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। गलियारों में सुगबुगाहट है कि पिछले कई वर्षों से सफाई व्यवस्था संभाल रही केपीएस इन्वायरोटेक प्रा. लि. एक बार फिर मैदान में उतरने की तैयारी में है। दिलचस्प बात यह है कि सात वर्षों के कार्यकाल में कंपनी की कोई ऐसी उल्लेखनीय उपलब्धि जनता को नजर नहीं आई, जिसे उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सके, लेकिन पालिका के सोशल मीडिया मंचों पर उसकी उपलब्धियों का गुणगान जरूर देखने को मिल रहा है।
चर्चा यह भी है कि टेंडर प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही नियमों में ऐसे बदलावों की तैयारी चल रही है, जिससे स्थानीय प्रतिभागियों के लिए रास्ते कठिन हो जाएं और चुनिंदा खिलाड़ियों के लिए मैदान आसान। यदि यह सच है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर टेंडर प्रतिस्पर्धा के लिए बन रहा है या किसी विशेष संस्था के स्वागत के लिए?
सूत्रों की मानें तो सफाई व्यवस्था के नाम पर एक कथित “डमी संस्था” के भी मैदान में उतरने की चर्चा है। जानकार इसे ऐसी रणनीति बता रहे हैं जिसमें हार-जीत दोनों स्थितियों में फायदा एक ही खेमे को मिलने की संभावना रहती है। यानी कहावत वाली स्थिति—”दोनों हाथ में लड्डू”।
वर्तमान में सफाई व्यवस्था पर प्रतिमाह लगभग 10.21 लाख रुपये खर्च होने की बात कही जा रही है। चर्चाएं हैं कि नया टेंडर इससे कहीं अधिक राशि पर जा सकता है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि बढ़े हुए खर्च के बदले उसे क्या अतिरिक्त सुविधाएं और बेहतर सफाई व्यवस्था मिलने वाली है?
पर्यावरण मित्रों के हितों को लेकर भी चिंताएं सामने आ रही हैं। कर्मचारियों के अधिकारों, वेतन और सुविधाओं पर कहीं कोई असर न पड़े, इसे लेकर श्रमिक वर्ग में भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर सफाई व्यवस्था का असली आधार वही कर्मचारी हैं, जिनके कंधों पर पूरे नगर की स्वच्छता टिकी होती है।
फिलहाल टेंडर प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही चर्चाओं का दौर तेज है। यदि सब कुछ पारदर्शी और नियमों के अनुरूप है तो नगर पालिका को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में पारदर्शिता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देना।
अब देखना यह होगा कि टेंडर की फाइलें सफाई व्यवस्था को चमकाती हैं या फिर सवालों की धूल और ज्यादा उड़ा देती हैं। “नगर की सफाई कैसी हुई, यह तो जनता जानती है, लेकिन ठेकेदार की किस्मत जरूर सात साल से चमकती नजर आ रही है!”

