पिथौरागढ़ – आस्था और विश्वास का तीर्थ- उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पांखू गाँव में स्थित एक प्रसिद्ध न्याय की देवी माँ कोटगाड़ी मंदिर, जहाँ न्याय के लिए लगायी जाती हैं अर्जी, माँ करती हैं न्याय।

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पिथौरागढ़ – आस्था और विश्वास का तीर्थ- उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पांखू गाँव में स्थित एक प्रसिद्ध न्याय की देवी माँ कोटगाड़ी मंदिर, जहाँ न्याय के लिए लगायी जाती हैं अर्जी, माँ करती हैं न्याय।

पिथौरागढ़। देवभूमि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पांखू गाँव में स्थित एक प्रसिद्ध न्याय की देवी का मंदिर है। स्थानीय लोग उन्हें भगवती कोकिला के रूप में पूजते हैं। सात्विक वैष्णवी रूप में, जहाँ मूर्ति को ढंक कर रखा जाता है। मान्यता है कि यहाँ आए फ़रियादियों को पाँच पीढ़ियों तक का न्याय मिलता है; लोग स्टाम्प पेपर या पत्र में अपनी अर्ज़ी लिखकर देवी के दरबार में रखते हैं। प्रसिद्ध मंदिर में चैत्र-अश्विन की अष्टमी और भादों की ऋषि पंचमी पर विशेष मेलों का आयोजन होता हैं, आस्था के इस तीर्थ को कुमाऊँ का “सुप्रीम कोर्ट” भी कहा जाता है।

कोटगाड़ी माता—जिन्हें कोकिला माता या भगवती वैष्णवी भी कहा जाता है—कुमाऊँ की सबसे अलग ‘न्यायिक’ देवी हैं। पिथौरागढ़ जिले के थल-कोटमन्या रोड पर पांखू गाँव से 02 किमी पैदल दूरी पर। बेरीनाग-डीडीहाट के बीच पूर्वी रामगंगा के किनारे बसे इस छोटे मंदिर को स्थानीय लोग “अंतिम दिव्य अदालत” मानते हैं।

मान्यता के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य ने यहाँ आकर इसकी शक्ति का उल्लेख किया, इसलिए इसे शक्ति-पीठों में से एक माना जाता है। देवी को सात्विक वैष्णवी रूप में पूजा जाता है; मूर्ति पर हमेशा वस्त्र ढका रहता है, दर्शन नहीं होते।लोग स्टाम्प-पेपर या सादे काग़ज़ पर अपना दुख-फ़रियाद लिखकर मंदिर में रख देते है।ज़मीन, संपत्ति, झगड़ा, कोर्ट-केस आदि। माना जाता है कि देवी पाँच पीढ़ियों तक के अन्याय का निपटारा करती हैं, और झूठी अर्ज़ी करने वाले को दंड मिलता है।

चितई के गोलू देवता की तरह कोटगाड़ी को भी “न्याय की देवी” कहा जाता है; सुप्रीम कोर्ट से निराश लोग यहाँ आते हैं।

➡️ पूजा-विधि और मेले:

मुख्य उत्सव चैत्र और अश्विन मास की अष्टमी को, तथा भादों की ऋषि पंचमी को लगते हैं; इन दिनों दूर-दूर से भक्त आते हैं, भक्तों का विश्वास है कि सच्ची अर्जी पर देवी तुरंत हस्तक्षेप करती हैं—कहते हैं “यहाँ देर भी नहीं और अंधेर भी नहीं हैं ।

➡️विशेष – कोटगाड़ी के दरबार में काग़ज़ों का ढेर जमा रहता है, जो लोगों की शिकायत-प्रार्थना का प्रमाण है। न्याय मिलने पर लोग घंटी, छत्र या अन्य भोग चढ़ाते हैं। संक्षेप में कहा जाये तों मां कोटगाड़ी सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की न्याय-आशा का जीवंत प्रतीक है, जहाँ लोग कानूनी उलझनों को देवी के भरोसे छोड़ देते हैं।

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