जज्बे को सलाम – समर्पण, संघर्ष और संकल्प की मिसाल: माँ पूर्णागिरी पर्यावरण संरक्षण समिति की अध्यक्ष “दीपा देवी”, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया ।

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जज्बे को सलाम – समर्पण, संघर्ष और संकल्प की मिसाल: माँ पूर्णागिरी पर्यावरण संरक्षण समिति की अध्यक्ष “दीपा देवी”, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है।

टनकपुर (चम्पावत)। जब समाज अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने से कतराता है, तब कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी सरकारी सहायता के, चुपचाप धरती के भविष्य को बचाने में जुट जाते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायी शख्सियत हैं माँ पूर्णागिरी पर्यावरण संरक्षण समिति की अध्यक्ष दीपा देवी, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है।

“दीपा देवी” का संघर्ष साधारण नहीं है। एक ओर घर, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियाँ, तो दूसरी ओर पर्यावरण के प्रति अटूट समर्पण। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद वे बीते चार वर्षों से लगातार पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। उम्र भले ही कम हो, लेकिन अनुभव और दूरदृष्टि उनकी योग्यता और नेतृत्व क्षमता को साफ़ तौर पर दर्शाती है।

उनके नेतृत्व में समिति द्वारा सफाई अभियान, वृक्षारोपण और पॉलीथिन उन्मूलन जैसे कार्य निरंतर किए जा रहे हैं। विशेष रूप से सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ उनका अभियान न केवल सराहनीय है, बल्कि नवाचार से भरा हुआ भी है। दीपा देवी और उनकी टीम ने सिंगल यूज प्लास्टिक से ईको ब्रिक्स तैयार कर जिले का पहला सोफा चेयर बनाया, जिसमें 130 किलो 800 ग्राम प्लास्टिक का पुनः उपयोग किया गया। यह प्रयोग न सिर्फ़ पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि कचरा नहीं, सोच बदलने की ज़रूरत है।

ग्रामीण हो या शहरी क्षेत्र, दीपा देवी की टीम हर जगह सक्रिय रूप से काम कर रही है। सबसे खास बात यह है कि टीम में पुरुषों से अधिक महिलाओं की भागीदारी है, जो महिला सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता की एक सशक्त मिसाल पेश करती है। महिलाएँ घर की चौखट से निकलकर पर्यावरण की लड़ाई में आगे आ रही हैं, और इसकी प्रेरणा स्वयं दीपा देवी हैं।

हैरानी की बात यह है कि इतने सराहनीय और ज़मीनी स्तर पर प्रभावी कार्यों के बावजूद अब तक सरकार या जिला प्रशासन की ओर से कोई ठोस मदद नहीं मिल पाई है। आर्थिक समस्याएँ बार-बार उनके रास्ते में बाधा बनती हैं, लेकिन दीपा देवी का हौसला आज भी अडिग है। वे मानती हैं कि अगर नीयत साफ़ हो और संकल्प मजबूत, तो रास्ते अपने आप बनते हैं।

दीपा देवी का यह सफर सिर्फ़ पर्यावरण बचाने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वच्छ भविष्य देने का है। उनका कार्य हमें यह सिखाता है कि बदलाव बड़े पद या बड़ी सहायता से नहीं, बल्कि सच्चे इरादों और निरंतर प्रयासों से आता है।

निस्संदेह, माँ पूर्णागिरी पर्यावरण संरक्षण समिति और दीपा देवी का योगदान समाज के लिए प्रेरणा है। ऐसे महान कार्यों को पहचान और सहयोग मिलना चाहिए, ताकि यह मुहिम और अधिक व्यापक रूप ले सके।

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