उत्तराखंड के पंचायती चुनाव के नतीजों ने जगाई नयी उम्मीद, इस बार उत्तराखण्ड के मतदाताओं ने परंपरागत वोटिंग पैटर्न से हटकर एक नई मिसाल की पेश । शशांक पाण्डेय

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उत्तराखंड के पंचायती चुनाव के नतीजों ने जगाई नयी उम्मीद, इस बार उत्तराखण्ड के मतदाताओं ने परंपरागत वोटिंग पैटर्न से हटकर एक नई मिसाल की पेश । शशांक पाण्डेय.

चम्पावत। उत्तराखण्ड के हालिया पंचायती चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि यह एक वैचारिक क्रांति और राजनीतिक परिपक्वता का प्रतीक बनकर उभरे। जहाँ बीते वर्षों में पंचायत चुनाव अक्सर वंशवाद, जातिवाद, शराब और पैसे के सहारे लड़े जाते रहे, वहीं इस बार के चुनावों ने इस प्रवृत्ति को झकझोर कर रख दिया। इन चुनावों ने दर्शाया कि जनता अब न सिर्फ वोट दे रही है, बल्कि सोच-समझकर नेतृत्व चुन रही है। गाँव के मतदाता अब बदल चुके हैं। मोबाइल, इंटरनेट और शिक्षा के प्रभाव से ग्रामीण मतदाता पहले से कहीं अधिक जागरूक हो चुका है। इस बार उत्तराखण्ड के मतदाताओं ने परंपरागत वोटिंग पैटर्न से हटकर एक नई मिसाल पेश की। उन्होंने यह साबित किया कि अब केवल जाति, बिरादरी, पैसे और व्यक्तिगत संबंधों से कोई चुनाव नहीं जीत सकता।

जहाँ पहले चुनावों के दौरान प्रत्याशियों द्वारा शराब और नगदी बांटना एक आम बात मानी जाती थी, वहीं इस बार कई गांवों में ऐसी गतिविधियों का विरोध हुआ। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने ऐसे उम्मीदवारों को साफ मना कर दिया, जो केवल धनबल और बाहुबल के दम पर चुनाव लड़ रहे थे। मतदाताओं ने ईमानदारी, समाजसेवा और सक्रिय जनसंपर्क को अपना मापदंड बनाया। उत्तराखण्ड जैसे शांत और सरल राज्य में भी स्थानीय राजनीति में परिवारवाद ने अपनी जगह बना ली थी। लेकिन इस बार का जनादेश इस राजनीति के लिए झटका साबित हुआ। अनेक क्षेत्रों में ऐसे नए प्रत्याशी विजयी हुए, जो किसी राजनीतिक खानदान से नहीं थे, लेकिन उन्होंने समाज के साथ अपनी सीधी भागीदारी और सेवा के बल पर लोगों का विश्वास जीता।

यह संकेत करता है कि अब केवल नाम का प्रभाव नहीं, बल्कि काम का मूल्य है। जनता अब देख रही है कि किसने उनके साथ मुश्किल समय में खड़ा होकर काम किया, और किसने केवल चुनाव के समय गांव का रुख किया। इस पंचायती चुनाव में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी विशेष रूप से उत्साहजनक रही। एक ओर जहां महिलाओं ने बड़ी संख्या में चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत हासिल की, वहीं दूसरी ओर युवाओं ने अपने जोश, नई सोच और तकनीकी समझ के दम पर मतदाताओं को प्रभावित किया। कई महिला प्रत्याशियों ने अपने गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया और उसी के आधार पर वोट हासिल किए। यह संकेत है कि उत्तराखण्ड की पंचायतें अब बदलाव के दौर से गुजर रही हैं – एक ऐसी पंचायत, जहाँ महिलाओं की भूमिका केवल “आरक्षण” तक सीमित नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी भी है।

पहली बार ऐसा देखा गया कि वोट डालते समय मतदाताओं के दिमाग में सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, रोजगार जैसे मुद्दे थे। प्रत्याशी इन मुद्दों पर जनसभाएँ कर रहे थे, और जनता उन पर सवाल भी कर रही थी। यह लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है।उत्तराखण्ड के ग्रामीण इलाकों में विकास की दर अब भी धीमी है, लेकिन इन चुनावों में लोगों ने अपने गांवों की आवश्यकताओं के अनुसार नेतृत्व का चयन किया। इसका सीधा असर पंचायतों के कामकाज पर पड़ेगा, और उम्मीद की जा सकती है कि ज़मीनी विकास अब तेजी से होगा।

उत्तराखण्ड के इन पंचायती चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर जनता चाहे, तो लोकतंत्र को सही दिशा में ले जा सकती है। इस बार का चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, सोच का था। जनता ने दिखा दिया कि वह अब ठगे जाने को तैयार नहीं। वह अब सवाल करती है, सोचती है, और निर्णय लेती है। यह चुनाव लोकतंत्र के उस रूप की शुरुआत है जहाँ ‘जनता सबसे ऊपर’ है। और जब जनता जिम्मेदारी से अपने अधिकार का प्रयोग करती है, तो एक बेहतर और मजबूत भारत की नींव रखी जाती है।

(लेखक राजनीति विज्ञान विषय के शिक्षक हैं)

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