लोहाघाट का जल संकट एक गंभीर और उपेक्षित जनसमस्या बनता जा रहा है, जिस कारण भीषण जल संकट झेल रहा है यह नगर :- शशांक पाण्डेय

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लोहाघाट का जल संकट एक गंभीर और उपेक्षित जनसमस्या बनता जा रहा है, जिस कारण भीषण जल संकट झेल रहा है यह नगर :- शशांक पाण्डे

लोहाघाट (चम्पावत)।उत्तराखंड राज्य का चंपावत जिला प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली और शांत वादियों के लिए जाना जाता है। इसी जिले में बसा एक छोटा लेकिन ऐतिहासिक नगर है लोहाघाट। यह नगर प्राचीन मंदिरों, पहाड़ी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन आज यह नगर एक अत्यंत गंभीर समस्या भीषण जल संकट से जूझ रहा है । यह संकट केवल पेयजल की असुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य से जुड़ी अनेक समस्याओं को जन्म दे रहा है।

वर्ष 2025 की गर्मियों में लोहाघाट में जल संकट विकराल रूप धारण कर चुका है। नगर के अधिकांश मोहल्लों में हर तीसरे या चौथे दिन ही जल आपूर्ति हो रही है। कई इलाकों में तो नलों से एक बूँद पानी नहीं आ रहा है। लोग अपने सिर पर बाल्टी, डिब्बे और बोतलें लेकर दूर-दराज के प्राकृतिक स्रोतों या हैंडपंप से पानी लाने को मजबूर हैं। हालत यह है कि लोगों को पीने, खाना पकाने, नहाने और कपड़े धोने जैसे मूलभूत कार्यों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

लोहाघाट में जल संकट के कई मुख्य कारण है। सबसे पहला कारण है प्राकृतिक जल स्रोतों का सूखना।लोहाघाट के आसपास क्षेत्र के कई प्रमुख जल स्रोत जल आपूर्ति का प्रमुख आधार रहे हैं। लेकिन बीते वर्षों में लगातार कम बारिश, बढ़ते तापमान और जल प्रबंधन की लापरवाही के चलते ये स्रोत या तो सूख चुके हैं या उनका जल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है।दूसरा कारण जनसंख्या में वृद्धि और योजनाओं की कमी के रूप में सामने आता है। लोहाघाट नगर का क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन उसके अनुरूप जल आपूर्ति की योजनाएं विकसित नहीं की गईं। जल संस्थान के अनुसार, नगर को प्रतिदिन जितनी आवश्यकता है, उतनी माँग पूरी नहीं हो पा रही है। वही अधूरी सरकारी योजनाएं भी जल संकट को बढ़ा रही है। जल जीवन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं लोहाघाट में अब भी अधूरी हैं। सरयू लिफ्ट पेयजल योजना, जो कि इस संकट का स्थायी समाधान बन सकती है, वह वर्षों से सिर्फ कागज़ों में ही चल रही है। इसके साथ ही भूजल दोहन और अनियोजित निर्माण भी जल संकट को बढ़ा रहे हैं। नगर में बिना योजना के हो रहा निर्माण कार्य, वनों की कटाई और भूजल दोहन ने पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ दिया है। परिणामस्वरूप वर्षाजल को संचय करने की प्रणाली भी ध्वस्त हो गई है।

जल संकट से परेशान होकर लोहाघाट की जनता कई बार सड़कों पर उतर चुकी है। संघर्ष समिति, व्यापार मंडल और सामाजिक संगठनों ने मिलकर खाली बर्तनों के साथ धरने-प्रदर्शन किए हैं। कई बार जल संस्थान और नगरपालिका कार्यालयों का घेराव भी हुआ है। लोग मांग कर रहे हैं कि सरयू लिफ्ट योजना को जल्द लागू किया जाए और सभी टंकियों में नियमित जल आपूर्ति की जाए। स्थानीय प्रशासन द्वारा जल संकट से निपटने के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं जैसे – टैंकरों से पानी पहुँचाना, हैंडपंप मरम्मत, जल संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान आदि। लेकिन ये सभी प्रयास वर्तमान स्थिति को देखते हुए बहुत ही अल्पकालिक और अपर्याप्त हैं। जब तक स्थायी समाधान जैसे सरयू लिफ्ट योजना और जल स्रोतों का पुनर्जीवन नहीं होता, तब तक समस्या बनी रहेगी।

इसके समाधान की दिशा में कुछ सुझाव पर बात की जाये तो जल संरक्षण अभियान को जन आंदोलन बनाया जा सकता है और बारिश के जल का संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) अनिवार्य किया जा सकता है। इसके साथ ही सरयू लिफ्ट पेयजल योजना को तुरंत क्रियान्वित किया जाए।स्थानीय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए वैज्ञानिक योजना बनाई जाए। जनसंख्या के अनुसार जल आपूर्ति की नई योजनाएं लागू की जाएं। लोगों में पानी की बचत और सतर्क उपयोग के लिए जनजागरूकता फैलाई जाए। तभी कुछ परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

लोहाघाट का जल संकट केवल एक नगर की समस्या नहीं है, यह पूरे पर्वतीय क्षेत्र की चेतावनी है। यह हमें बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और लापरवाही भविष्य में कितनी गंभीर समस्याएं ला सकती है। लोहाघाट को इस संकट से उबारने के लिए केवल सरकार ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जब तक जल को एक मूल्यवान संसाधन मानकर उसका विवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया जाएगा, तब तक “जल ही जीवन है” केवल एक नारा ही बना रहेगा।

(लेखक पर्यावरण प्रेमी है एवं समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं)

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